स्वप्न मेरे

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

बच्चों ने भी बचपन पीछे छोड़ दिया ...

जंगल जाने की जो हिम्मत रखते हैं
 काँटों की परवाह कहाँ वो करते हैं

 पुरखे हम से दूर कहाँ रह पाते हैं
 बच्चों की परछाई में ही दिखते हैं

 साहिल पर कितने पत्थर मिल जाएँगे
 मोती तो गहरे जा कर ही मिलते हैं

 दो आँसू तूफान खड़ा कर देते हैं
 कहने को बस आँखों में ही पलते हैं

 कलियों को इन पेड़ों पर ही रहने दो
 गुलदस्ते में फूल कहाँ फिर खिलते हैं

 तू तू मैं मैं होती है अब आपस में
 गलियों में तंदूर कहाँ अब जलते हैं

 बच्चों ने भी बचपन पीछे छोड़ दिया
 कंप्यूटर की बातें करते रहते हैं

कहते हैं गुरु बिन गत नहीं ... उपरोक्त गज़ल में भी कुछ शेरों में दोष है और उसको गुरुदेव पंकज सुबीर जी की पारखी नज़र ने देख लिया ... उनका बहुत बहुत आभार गज़ल को इस नज़रिए से देखने का ... यहां मैं शेर के दोष और उनके सुझाव और विश्लेषण को लिख रहा हूँ जिससे की मेरे ब्लॉग को पढ़ने वालों को भी गज़ल की बारीकियां समझने का मौका मिलेगा ...

जंगल जाने की जो हिम्मत रखते हैं
 काँटों की परवाह कहाँ वो करते हैं ( मतले में ईता का दोष बन रहा है किन्‍तु ये छोटी ईता है जिसे हिंदी में मान्‍य किया गया है । मतले के दोनों काफियों में रखते और करते में जो ‘ते’ है वो शब्‍द से हटने के बाद भी मुकम्‍मल शब्‍द ‘रख’ और ‘कर’ बच रहे हैं । इसका मतलब ‘ते’ रदीफ हो गया है । तो अब रदीफ केवल ‘हैं’ नहीं होकर ‘ते हैं’ हो गया है । बचे हुए ‘रख’ और ‘कर’ समान ध्‍वनि वाले शब्‍द अर्थात काफिया होने की शर्त पर पूरा नहीं उतर रहे हैं । खैर ये छोटी ईता है सो इसे हिंदी में माफ किया गया है । मगर वैसे ये है दोष ही । ) 

 पुरखे हम से दूर कहाँ रह पाते हैं ( रदीफ और काफिये की ध्‍वनियों को मतले के अलावा किसी दूसरे शेर के मिसरा उला में नहीं आना चाहिये हुस्‍ने मतला को छोड़कर । तो इसको यूं किया जा सकता है ‘दूर कहां रह पाते हैं पुरखे हमसे’)
 बच्चों की परछाई में ही दिखते हैं

 दो आँसू तूफान खड़ा कर देते हैं ( इसमें आाखिर में रदीफ का दोहराव और काफिये की ध्‍वनि का दोहराव है इसको यूं करना होगा ‘कर देते हैं दो आंसू तूफान खड़़ा ) 
 कहने को बस आँखों में ही पलते हैं

 तू तू मैं मैं होती है अब आपस में ( रदीफ की ध्‍वनि आ रही है इसको यूं करना होगा ‘आपस में होती है तू तू मैं मैं अब’ )
 गलियों में तंदूर कहाँ अब जलते हैं

मंगलवार, 27 मार्च 2012

लौटना बच्चों का बाकी है अभी तक गाँव में ...

जिस्म काबू में नहीं और मौत भी मिलती नहीं
या खुदाया रहम कर अब जिंदगी कटती नहीं

वक्त कैसा आ गया तन्हाइयां हैं हम सफर
साथ में यादें हैं उनकी दिल से जो मिटती नहीं

लौटना बच्चों का बाकी है अभी तक गाँव में
कुछ बुजुर्गों की नज़र इस राह से हटती नहीं

हाथ में जुम्बिश नहीं है आँख में है मोतिया
उम्र के इस दौर में अपनों पे भी चलती नहीं

डूब के मर जाऊं जिसमें उम्र या वापस मिले
वो नदी अब तो हमारे शहर से बहती नहीं

टूट कर अपनी जड़ों से कब तलक रह पाओगे
खंडहरों की नीव लंबे वक्त तक रहती नहीं

धूप है बारिश कभी तो छाँव की बदली भी है
एक ही लम्हे पे आकर जिंदगी रूकती नहीं

बुधवार, 21 मार्च 2012

हाथ में पहले तो खंजर दे दिया ...

हाथ में पहले तो खंजर दे दिया
फिर अचानक सामने सर दे दिया

ले लिए सपने सुनहरी धूप के
और फिर खारा समुन्दर दे दिया

एक बस फरमान साहूकार का
छीन के घर मुझको छप्पर दे दिया

लहलहाती फसल ले ली सूद में
जोतने को खेत बंजर दे दिया

नौच खाया जिस्म सबके सामने
चीथडा ढंकने को गज भर दे दिया

चाकुओं से गोद कर इस जिस्म को
खुदकशी का नाम दे कर दे दिया

तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया

बुधवार, 14 मार्च 2012

न ज़ख्मों को हवा दो ...

न ज़ख्मों को हवा दो
कोई मरहम लगा दो

हवा देती है दस्तक
चरागों को बुझा दो

लदे हैं फूल से जो
शजर नीचे झुका दो

पडोसी अजनबी हैं
दिवारों को उठा दो

मुहब्बत मर्ज़ जिनका
उन्हें तो बस दुआ दो

मेरी नाकामियों को
सिरे से तुम भुला दो

जुनूने इश्क में तो
फकत उनसे मिला दो

बुधवार, 7 मार्च 2012

नेह गुलाल ...

सभी पढ़ने वालों को होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं ... रंगों का पर्व सब को प्रेम के रंग में रंगे ... दिलों का वैर मिटे जीने की उमंग जगे ...

दो हाथों के मध्य तुम्हारे
कंचन जैसे गाल
जाने कौन बात पे हो गये
अधरों जैसे लाल

स्पर्श मात्र को जाने तुमने
क्या समझा जो
सिमट गयीं तुम ऐसे जैसे
छुई मुई की डाल

प्रेम की लाली
बदन पे तेरे ऐसी बिखरी
बिन होली के रंग गया जैसे
कोई नेह गुलाल

अंग अंग से
अंकुर फुट रहे यौवन के
चंचल बलखाती इठलाती
हिरनी जैसी चाल

कारी बदरी ज्यों
चंदा को छू उड़ जाए
गालों से अठखेली करते
चंचल रेशम बाल