लिक्खी है गज़ल ताज़ा खामोश इबारत में
दिन रात इसे रखना, होठों
की हिफाज़त में
हंसती है कहीं पायल, रोते
हैं कहीं घुँघरू
लटकी हैं कई यादें जालों सी इमारत में
तारीफ़ नहीं करते अब मुझपे नहीं मरते
आता है मज़ा उनको दिन रात शिकायत में
छलके थे उदासी में, निकले हैं ख़ुशी बन कर
उलझे ही रहे हम तो आँखों की सियासत में
हालांकी दिया तूने ज़्यादा ही ज़रुरत से
आता है मजा लेकिन बचपन की शरारत में
इस दौर के लोगों का कैसा है चलन
देखो
अपने ही सभी शामिल रिश्तों की तिजारत
में
हर वक़्त मेरे सर पर रहमत सी बरसती है
गुज़रे थे मेरे दिन भी कुछ माँ की इबादत
में
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