स्वप्न मेरे: माँ

बुधवार, 17 जुलाई 2013

माँ

रात में दादी के पांव दबाती   
पिता के कमजोर कंधे मजबूती से थामे 
घर की चरमराती दिवार हाथों पे उठाए  
पैरों में चक्री लगाए हर शै में नज़र आती 
थी तो माँ पर फिर भी नहीं थी   

महीने की पहली तारीख 
सिगरेट के पैसे निकालने का बाद 
बची पगार माँ के हाथ में थमाने के अलावा 
पिताजी बस खेलते थे ताश 
(हालांकि ये शिकायत नहीं, 
और माँ को तो बिलकुल नहीं) 
कभी नहीं देखा उन्होंने खर्चे का हिसाब 
मेरी बिमारी से लेकर मुन्नी की किताबों का जवाब 
सब कुछ अपने सर पे रक्खे 
थी तो माँ पर फिर भी नहीं थी 

हालांकि होता था पापा का नाम  
बिरादरी में लगने वाले हर तमगे के पीछे 
मेरे नम्बरों से लेकर मुन्नी के मधुर व्यवहार तक 
कई बार देखा है पापा को अपनी पीठ थपथपाते 
पर सच कहूं तो ... होती थी बस माँ 
जो हो के भी हर जगह, नहीं होती थी कहीं 

सुना है बड़े बूढों से, ज्ञानी संतों से 

भगवान हो कर भी हर जगह ... कहीं नहीं होते 
  

70 टिप्‍पणियां:

  1. माँ भी तो माँ तभी बनती है जब उसको माँ कहने वाले उसके अपने उसके इर्दगिर्द हों..जैसे भगवान भी भक्त के बिना अधूरा है..

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  2. माँ तेरे कदमों पे सारा जहाँ है...

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  3. बहुत सुदंर रचना
    इसे रचना क्या कहें, ये तो हम सबको बड़ों का आशीर्वाद है

    क्या बात

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  4. पर सच कहूं तो ... होती थी बस माँ
    जो हो के भी हर जगह, नहीं होती थी कहीं..... बिल्कुल सही कहा माँ ऐसी ही होती हैं नहीं दिखने वाले भगवान की तरह... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति .......!!

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  5. माँ द्वारा किया गया त्याग, मार्मिक !

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  6. छोटी छोटी मगर प्रभावी बातें--
    प्रभावी प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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  7. मन को छू लेनेवाली मार्मिक कविता.....
    बेहद प्रभावशाली पंक्तियां....

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  8. भगवान हर जगह नहीं हो सकते इसीलिए माँ होती है .... जिस तरह भगवान हो कर भी नहीं हैं उसी तरह माँ हो कर भी माँ की उपलब्द्धियां नहीं दिखतीं

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  9. सच कहा -- माँ इश्वर तुल्य होती है।
    बढ़िया रचना।

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  10. ......पढ़कर झिरझिरी हो गई......सीधे मन में बैठ गईं पंक्तियां

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  11. माँ तुमसे ही थी सब रौनकें ... तुम नहीं तो रौनको में भी अच्छा नहीं लगता ...
    दिल से निकले भाव आदरणीय ...

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  12. घर को सशक्त काँधों में सम्हाले रखने में माँ सा कोई नहीं।

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  13. बहुत सुदंर रचना

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  14. भई वाह ,
    क्या समर्पण है माँ के प्रति ..
    सुखद !!

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  15. मन को छू लेनेवाली दिल से लिखी ..सुन्दर रचना ....!!

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  16. बहुत ही हृदयस्पर्सी रचना.

    रामराम.

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  17. माएं कभी नहीं बांधती सेहरा अपने सर....
    हमारी हर बात का सेहरा माँ के सर.........

    सादर
    अनु

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  18. माँ के लिये इतने गहरे और तीव्र भाव कि एक सुन्दर कविता बन जाए बहुत कम देखने मिलते हैं । वह भी लगातार ..। दो शब्दों की प्रशंसा काफी नही है ।

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  19. सब कुछ अपने सर पे रक्खे
    थी तो माँ पर फिर भी नहीं थी
    Yahi maa hoti hai....aap jaise bete use mil jayen to usee me dhanya ho jati hai......aapki maa pe likhi rachanayen kamalki hoti hain.....khushnaseeb hai wo maa...

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  20. व्यक्त करना कठिन है - केवल अनुभवगम्य!

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  21. माँ-
    जीवन का सृजन,आधारशिला जिसकी उंगलियां कभी नहीं कांपी बच्चों की
    उंगलियाँ पकडने में----
    भाई जी आपने आंखे नम कर दी
    मन को छूती रचना
    सादर

    आग्रह है- "केक्टस"

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  22. माँ पर आपकी हर कृतियाँ ,मेरा मन मोह लेती है...अश्रुमिश्रित हर्ष उल्लास के भाव आते जाते रहते हैं...बहुत ही सुन्दर आपकी एक और रचना नासवा जी..!!

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  23. माँ इसीलिये तो माँ कहलाती है कि वो पास नहीं है फिर भी हमारे पास ही होती है.इतना ख्याल अपने बच्चे का सिर्फ माँ ही तो रख सकती है,
    भावपूर्ण कविता.

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  24. भगवान हो कर भी हर जगह ... कहीं नहीं होते

    इस वाक्य से माँ को श्रद्धा सुमन प्रस्तुत कर अद्भुत अभिव्यक्ति प्रतीत हो रही है

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  25. माँ के सिर पर ही होता है कलश पवित्रता का .ॐ शान्ति .माँ ही होती है घर की लाज शान और मान .चाहे तो उघाड़ दे चाहे तो ढके रहे .

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  26. माँ को भगवान क्यूँ कहते हैं इस को चरितार्थ कर दिया आप ने , श्रेष्ठ रचनाओं में भी श्रेष्ठ रचना का गौरव पाने योग्य रचना , भाई इस मर्तबा बधाई नहीं, नमन ............... जियो भाई और ख़ूब तरक़्क़ी करो

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  27. आपके भावभीनी शब्दों को पढकर सच में निःशब्द हो जाता हूँ. सच में ईश्वर का रूप है कोई पृथ्वी पर तो वो माँ ही हैं.

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  28. सुना है बड़े बूढों से, ज्ञानी संतों से

    भगवान हो कर भी हर जगह ... कहीं नहीं होते ……बेहद गहन मगर सत्य

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  29. माँ का होना सम्पूर्णता है ..बहुत सही सुन्दर अभिव्यक्ति

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  30. आँखें नाम कर दी आपने........लाजवाब।

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  31. सच ही तो कहा करते थे ज्ञानी और संत कि चाहकर भी ईश्वर हर जगह उपस्थित नहीं हो सकता था इसलिए उसने माँ बनायी।

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  32. हाँ! सही कहा ..सब कुछ आप खुद ही कह देते हैं तो कहने के लिए कुछ बचता कहाँ है ?

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  33. प्रभावी प्रस्तुति,आभार आदरणीय दिगम्बर नासवा जी।

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  34. माँ कभी अपना श्रेय नहीं लेती पर सबकुछ तो माँ ही करती है सच कहा -- माँ ईश्वर तुल्य होती है।

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  35. क्या बात है बहुत खूब ....मन को छू लेने भाव

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  36. "हालांकि होता था पापा का नाम
    बिरादरी में लगने वाले हर तमगे के पीछे
    मेरे नम्बरों से लेकर मुन्नी के मधुर व्यवहार तक
    कई बार देखा है पापा को अपनी पीठ थपथपाते
    पर सच कहूं तो ... होती थी बस माँ
    जो हो के भी हर जगह, नहीं होती थी कहीं
    सुना है बड़े बूढों से, ज्ञानी संतों से
    भगवान हो कर भी हर जगह ... कहीं नहीं होते"
    वाह... उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  37. पर सच कहूं तो ... होती थी बस माँ
    ........................................
    अंतर्मन को भिंगोते पवित्र भाव

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  38. सुना है बड़े बूढों से, ज्ञानी संतों से

    भगवान हो कर भी हर जगह ... कहीं नहीं होते
    बहुत खूब ...

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  39. बहुत-बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...!
    हम सभी जानते हैं.... माँ का योगदान कितना ज़्यादा होता है... मगर उसे याद बहुत कम लोग ही करते हैं!
    आपके इस जज़्बे को हर बार सलाम करते हुए.....

    ~सादर!!!

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  40. भगवानका रूप हे माँ ,सारा संसार माँ शब्द मैं समाजात

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  41. भगवान हो कर भी हर जगह ... कहीं नहीं होते
    माँ तो ऐसी ही होती है
    बहुत ही सुन्दर
    सादर!

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  42. Kya kahen...too good!!
    aapki aisi rachnaon par hum speechlees ho jaate hain aur khaas kar tab jab aap maa par kavitayen likhte hain!

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  43. बहुत अच्छी रचना, बहुत सुंदर

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  44. इतना सब कुछ और शिकायत भी नहीं।

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  45. माँ की तुलना भगवान से. बिल्कुल सही

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  46. all that we are and all that we ever hope to be..
    we all owe it to our mothers :)

    very lovely post !!

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  47. रात में दादी के पांव दबाती
    पिता के कमजोर कंधे मजबूती से थामे
    घर की चरमराती दिवार हाथों पे उठाए
    पैरों में चक्री लगाए हर शै में नज़र आती
    थी तो माँ पर फिर भी नहीं थी.....
    ..............बहुत सुंदर.

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  48. आपकी इस शानदार प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार २३/७ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है सस्नेह ।

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  49. मन को छू लेनेवाली मार्मिक कविता,बहुत सुंदर.

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  50. जीवन माँ का अवदान अनंत है पर दिखती नहीं ,जैसे ईश्वर
    latest दिल के टुकड़े
    latest post क्या अर्पण करूँ !

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  51. माँ के प्यार में निस्वार्थ भाव को समेटती आपकी खुबसूरत रचना.....

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  52. हालांकि होता था पापा का नाम
    बिरादरी में लगने वाले हर तमगे के पीछे
    मेरे नम्बरों से लेकर मुन्नी के मधुर व्यवहार तक
    कई बार देखा है पापा को अपनी पीठ थपथपाते
    पर सच कहूं तो ... होती थी बस माँ
    जो हो के भी हर जगह, नहीं होती थी कहीं

    सुना है बड़े बूढों से, ज्ञानी संतों से

    भगवान हो कर भी हर जगह ... कहीं नहीं होते


    जीवन में बहुत कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हमेशा नींव के पत्थर की तरह दिखाई नहीं देते...यह तो पुरुष प्रधान समाज की वो व्यवस्था है जिसमें स्त्री की पहचान पुरुष के नाम से होती है...पर यह भी सच है कि माँ और पिता दोनों का ही हमारे जीवन में अतुल्य योगदान होता है!
    कविता साझा करने हेतु आभार!

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  53. पर सच कहूं तो ... होती थी बस माँ
    जो हो के भी हर जगह, नहीं होती थी कहीं

    ...बिल्कुल सच...भगवान सब जगह नहीं हो सकता इसी लिए उसने माँ को बनाया...सदैव की तरह बहुत भावमयी रचना...

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  54. बस एक माँ... सब कुछ होकर भी कही नहीं होती माँ. मन को छू गई रचना, शुभकामनाएँ.

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  55. माँ ही तो इस सृष्टि की आधार है किन्तु पितृसत्तात्मक समाज की दृष्टि में उसे दोयम दर्जे की जगह मिली - जबकि बच्चे को प्रथम शब्द से लेकर संस्कार तक वही देती है . वह वाकई वह होकर भी नहीं होती है . बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  56. आपकी इस रचना ने दिल छु लिया......
    माँ के प्रति आपकी यह भावपुर्ण अभिव्यक्ति पढ़कर अच्छा लगा...

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  57. था मेरी माँ का भी यही हाल एबी शराबी सबको तो निभा लेती थी माँ .

    सब बड़े काम कर लेती थी माँ ,

    मकान बनवाने से लेकर बेटी की शादी तक ,

    सब कुछ सहज और संपन्न होता जहां होती हम सब की माँ

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  58. माँ तो बस माँ ही होती है..!!! सुन्दर..

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  59. माँ की तरह भले ही न हो पर मुन्नी होती है हर जगह भरी-पूरी ईश्वरी की तरह. बहुत सुंदर कविता.

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है