स्वप्न मेरे: तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे ...

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे ...

धीरे धीरे अपने सारे दूर हुवे
तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे

बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे

नाते रिश्तेदार सभी उग आए हैं
लोगों का कहना है हम मशहूर हुवे

घुटनों से लाचार हुवे उस दिन जो हम
किस्से फैल गये की हम मगरूर हुवे

गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे

पहले उनकी यादें में जी लेते थे
यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे

82 टिप्‍पणियां:

  1. यह भौतिकता की चकाचौंध में हमारे लगातार निष्प्राण होते जाने की कहानी है।

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  2. बाहर भावुक विचार रखे आपने सर..बहुत सुन्दर...किसी की लिखी चंद पंक्तियाँ पेश करती हूँ...
    "कौन किसे दिल में जगह देता है
    सूखे पत्ते तो पेड़ भी गिरा देता है.

    वाकिफ रहो , इस दुनिया के रिवाजों से
    सांस रुक जाये तो , अपना ही जला देता है"

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  3. पाठक गण परनाम, सुन्दर प्रस्तुति बांचिये ||
    घूमो सुबहो-शाम, उत्तम चर्चा मंच पर ||

    शुक्रवारीय चर्चा-मंच ||

    charchamanch.blogspot.com

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  4. बहुत ही सुन्दर गजल .हर शेर लाजवाब लगा शुक्रिया

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  5. पहले उनकी यादें में जी लेते थे
    यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे
    .........बहुत खूब ....
    बहुत ही उम्दा लेखन .....नासवा जी!!

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  6. तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे
    ...बिलकुल सही कहा आपने सुंदर और शानदार गजल , बधाई

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  7. गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
    जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे

    जीवन के यथार्थ को बखूबी अभिव्यक्त किया है आपने .....!

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  8. बहुत मार्मिक गजल, आज की सच्चाइयों को बयान करती हुई...

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  9. घुटनों से लाचार हुवे उस दिन जो हम
    किस्से फैल गये की हम मगरूर हुवे
    गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
    जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे...
    दिल को छू गई ये पंक्तियाँ ! बड़े सुन्दरता से आपने सच्चाई को शब्दों में पिरोया है! इस उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई!

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  10. aisi panktiyaa tab likhi jaati hai jab .... aankho kaa dekhaa dil mehsoos karta hai

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  11. उफ़ इस अवस्था का दर्द ...सबको झेलना है एक दिन.

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  12. वर्तमान की गंभीर समस्या को बखूबी ग़ज़ल में उतरा है...

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  13. || ऐसी उम्दा गज़ल कही है आपने
    पढकर मेरे भाव सभी अंगूर हुवे ||


    सादर नमन इस बेशकीमती गजल के लिये सर...

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  14. गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
    जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे

    पहले उनकी यादें में जी लेते थे
    यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे

    हकीक़त है जिंदगी की.. भावुक करती रचना

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  15. जीवन मेन आने वाले उतार-चढ़ाव का भावनातंक रूप से बहुत ही सुंदर वर्णन किया है आपने!!! वाकई बहुत खूब लिखा है आपने आभार ...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है ... http://mhare-anubhav.blogspot.com/

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  16. लाजवाब ,बहुत ही सुन्दर गजल |

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  17. पहले उनकी यादें में जी लेते थे
    यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे

    शानदार और लाजबाब ..

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  18. सारा दर्द उतार दिया कुछ कहने लायक ही नही छोडा……………शानदार दिल को छूती गज़ल्।

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  19. behtareen ghazal !!
    buzurgon ka dard ap ke asha'ar men dhal gaya hai ,,shayad ghar se door rahne wale is takleef ko zyada shiddat se mahsoos bhi karte hain ,,
    man ko chhoone wale bhav ,,bahut umda

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  20. पहले उनकी यादें में जी लेते थे
    यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे...गजब की सुन्दर पंक्तियाँ. बहुत ही सुन्दर रचना. आभार

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  21. धीरे धीरे अपने सारे दूर हुवे
    तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे

    बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे
    Bhayanak kadvee sachhayee hai!

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  22. बुढ़ापे की लाचारी को सुन्दर ग़ज़ल में ढाला है आपने ।
    ग़ज़ल में कुछ जाना पहचाना सा भी लग रहा है ।

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  23. जीवन का याथार्त दिखती सुंदर प्रस्तुति...

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  24. Wah...bahut khub...

    Ek karara vyang bhudhape par yahan pahein
    http://www.poeticprakash.com/2009/06/old-age.html

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  25. गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
    जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे

    कड़वी सच्चाई बयाँ कर दी...बहुत ही हृदयस्पर्शी ग़ज़ल

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  26. बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे

    नाते रिश्तेदार सभी उग आए हैं
    लोगों का कहना है हम मशहूर हुवे ..

    गज़ल का हर शेर मर्मस्पर्शी ... मन को छूती हुयी गज़ल

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  27. बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे

    गहरे भाव लिए ग़ज़ल

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  28. गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
    जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे
    क्या बात कही है भाई!!
    एकदम तल्ख हक़ीक़त!

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  29. आह!! ये तो भीतर तक भेद गई...

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  30. बुढ़ापे की पीड़ा के ये शब्द अंतर्मन को झकझोर गए.
    बहुत खूब दिगम्बर जी !!!

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  31. सिम्प्ली फेंटास्टिक एण्ड माइंड ब्लोइंग, घुटने वाले शेर ने हतप्रभ कर दिया

    मज़ा आ गया सर जी

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  32. भाई दिगंबर नासवा जी! सीनियर सिटिज़न्स की भावनाओं और उनके अंदर की पीड़ा को ग़ज़ल के अशआर में बड़े करीने से पिरोया है आपने. बहुत खूब!

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  33. बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे ... bahut badhiyaa

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  34. धीरे धीरे अपने सारे दूर हुवे
    तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे

    बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे
    वाह ... बहुत खूब ।

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  35. बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे

    hridaysparshi gazal...har sher arthpoorn.

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  36. बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे

    ....लाज़वाब गज़ल...हरेक शेर आज के जीवन की सटीक और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति..

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  37. बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे

    पहले उनकी यादें में जी लेते थे
    यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे

    दिगंबर जी बहुत मार्मिक एहसास पिरोये हैं इस बार आपने अपनी इस लाजवाब ग़ज़ल में...ढेरों दाद कबूल अक्रें

    नीरज

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  38. हमें तो आपकी कविता चेतावनी लगी अपने लिए.. वो उन्होंने कहा है ना, निदा साहब ने
    उम्र होने को है पचास के पार,
    कौन है किस जगह पता रखना.

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  39. जीवन की चोटियों को छूने की चाह में,जीवन की गरिमा खो गई.
    मन को छूती रचना,सादर आभार.

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  40. जीवन की चोटियों को छूने की चाह में,जीवन की गरिमा खो गई.
    मन को छूती रचना,सादर आभार.

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  41. जीवन की चोटियों को छूने की चाह में,जीवन की गरिमा खो गई.
    मन को छूती रचना,सादर आभार.

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  42. सच तो यह है‍ कि आज क्‍या बूढ़े ,क्‍या बच्‍चे सब अकेले हैं।

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  43. बहुत सुंदर बेहतरीन पोस्ट
    मन को अच्छी लगती रचना,
    मेरे नए पोस्ट आइये स्वागत है

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  44. एक कटु यथार्थ को प्रस्तुत किया है मीठे बोलों में ।

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  45. हर शेर लाजवाब. कई ग़ज़लें पढ़ीं.पढता चला गया. ख़ुशी हुई की इतनी उम्दा गजलें पढने को मिलीं. अफ़सोस हुआ की पहले आपके ब्लॉग पर क्यों नहीं आया.

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  46. धीरे धीरे अपने सारे दूर हुवे
    तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे
    बहुत सुंदर

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  47. मेरी देर से आने की कुछ तो वजह होगी ..?
    इस उम्र में आप के विचार जान कर दिल को सुकून मिला | बाकि येही सच है !
    ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती है
    त्यों-त्यों जिंदगी घटती है
    यही जीवन की सच्चाई है
    जिंदगी ऐसे ही कटती है || "अकेला
    बहुत पहले मेने "बुढ़ापे दा सरमाया " पर
    अपने तजुर्बा बयान किया था |
    http://ashokakela.blogspot.com/2010/12/blog-post_27.html

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  48. आपने बुढ़ापा दिखा दिया...जो भविष्य को देख लेता है...उसे उदार होना ही पड़ता है...बच्चों और बच्चों के बच्चों से इतर हमें अपनी तन्हाई का इलाज़ खोजना चाहिए...

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  49. आपने बुढ़ापा दिखा दिया...जो भविष्य को देख लेता है...उसे उदार होना ही पड़ता है...बच्चों और बच्चों के बच्चों से इतर हमें अपनी तन्हाई का इलाज़ खोजना चाहिए...

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  50. सच में मशहूर होना वो भी लाचारी में कष्ट देता है.....

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  51. पहले उनकी यादें में जी लेते थे
    यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे.....
    .....लाजवाब!!!

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  52. गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
    जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुए

    एक बेहतरीन ग़ज़ल का लाजवाब शेर।
    दुनिया का यही दस्तूर है।

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  53. ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाई को
    उजागर करते हुए
    ला-जवाब और यादगार अश`आर...
    वाह !!

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  54. bahut hi umda gajal .......har shabd man ki gaharai ko bhigo gaya .....sunder prastuti ke liye badhai .

    aapke gajal ke har shabdo ko bayan kar rahi hai
    uski gaharai ....shabdo ka mayajal bhi hai yahan aur
    sacchai ko bhi aapne kiya hai bayan ...........bahut bahut badhai .aapki gajal bahut pasand aayi .

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  55. बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद। ।

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  56. जिंदगी की सच्चाई को गज़ल में खूबसूरती से बाँध दिया आपने

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  57. दिगंबर जी

    आपकी ये गज़ल आज के जमाने की सच्ची तस्वीर है . मेरे पास शब्द नहीं है कि , मैं आपकी इस गज़ल कि कोई तारीफ कर सकू,
    बधाई !!
    आभार
    विजय
    -----------
    कृपया मेरी नयी कविता " कल,आज और कल " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/11/blog-post_30.html

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  58. बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे

    बहुत सार्थक ग़ज़ल कही है आपने, सभी शेर दिल को छु गए!

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  59. मेरी टिप्पणी गम हो गई लगती है ...?
    इस उम्र में आप ने हम लोगो को याद किया
    उसके लिए शुक्रिया |
    आप की गजल के सच्चे अश'आर....सब को
    सोचने पे मजबूर करेंगें |
    इसपे बहुत पहले मेने भी "बुढ़ापे दा सरमाया "
    लिखी थी ,कभी समय मिले तो अपने विचार रखियेगा |
    शुभकामनायें |

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  60. हर शेर सच्चाई बयान करता हुआ है.
    लाजवाब लाजवाब ..

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  61. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति । मेर नए पोस्ट पर आकर मेरा मनोबल बढ़एं । धन्यवाद ।

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  62. 'पहले उनकी यादें में जी लेते थे
    यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे'

    बहुत खूब,नासवा भाई.
    पिछली गजलें भी बहुत अच्छी लगीं.

    'पिघलती धूप का सूरज कोई पागल निकाले
    लगेगी आग कह दो आसमां बादल निकाले'

    'किसी के पास है पैसा किसी के पास आंसू
    वो पागल जेब से कुछ कहकहे हरपल निकाले'

    'धीरे धीरे हर सैलाब उतर जाता है
    वक्त के साथ न जाने प्यार किधर जाता है '

    'भूल गए जो खून खराबा करते हैं
    खून के छींटे अपने पर भी गिरते हैं '

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  63. waah bahut khub......


    नाते रिश्तेदार सभी उग आए हैं
    लोगों का कहना है हम मशहूर हुवे

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  64. नियमित रूप से मेरे ब्लॉग पर आकर टिप्पणी देकर प्रोत्साहित करने के लिए शुक्रिया !

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  65. padhkar Man bhing gaya. Kamal kee anubhuti, usse bhee umda abhivyakti...

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  66. धीरे धीरे अपने सारे दूर हुवे
    तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे

    बचपन बच्चों के बच्चों में देखूंगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे


    पा्रिवारिक विखंडन और रिश्तों में संवेदनहीनता की पराकाष्ठा से दो-चार होते आप-हम सबका बयान है यह ग़ज़ल …

    आदरणीय दिगंबर जी
    बहुत श्रेष्ठ है आपकी यह ग़ज़ल !

    गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
    जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे

    मरे हुए को ढो'कर ले जाना तो बहुत बड़ी बात हो ही गई अब …
    स्थिति तो यह है कि मात्र सहारा दे'कर बीमार माता-पिता को उठने-बैठने में नाकुछ मदद करने तक की इंसानियत औलाद में नहीं रही …

    आपकी ग़ज़ल के लिए अधिक क्या कहूं …
    ऐसी रचनाएं वाह-वाह की मोहताज नहीं होतीं …
    नमन !


    मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  67. .


    आपकी पिछली पोस्ट्स की ग़ज़लों के लिए भी बधाई और आभार स्वीकार करें …

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  68. बचपन बच्चों के बच्चों में देखूँगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे

    क्या बात है.क्या क्या सोचते हैं,
    और क्या हो जाता है.

    सुन्दर भावपूर्ण पस्तुति के लिए आभार.

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  69. धीरे धीरे अपने सारे दूर हुवे
    तन्हा रहने को बूढ़े मजबूर हुवे

    बचपन बच्चों के बच्चों में देखूंगा
    कहते थे जो उनके सपने चूर हुवे


    वृध्दों के दर्द को बखूबी समझा और कहा है आपने ।

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  70. गाड़ी है पर कंधे चार नहीं मिलते
    जाने कैसे दुनिया के दस्तूर हुवे

    पहले उनकी यादें में जी लेते थे
    यादों के किस्से ही अब नासूर हुवे

    बेह्तरीन अभिव्यक्ति .बहुत सुन्दर.बधाई .मज़ा आ गया!

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है