स्वप्न मेरे: अक्टूबर 2026

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

ऐसे ही दाग चेहरे के स्वीकार कीजिए …

करना है ग़र तो आप इसे इनकार कीजिए,
वर्ना हमारी बात से इक़रार कीजिए.

अच्छी लगे जो बात हमारी तो यूँ करें,
अख़बार इस ग़ज़ल को लगातार कीजिए.

महफ़िल में इतने लोग हैं जिनसे मिले न दिल,
बस दूर दूर से ही नमस्कार कीजिए.

छोटी सही मगर वो सकारात्मक तो हो,
फिर मिल के इस विचार का विस्तार कीजिए.

क्यों बीच राह आपने रोका है नाव को,
इस पार कीजिए या तो उस-पार कीजिए.

बारूद के जो पेड़ उग आए हैं खेत में,
हो सकता है तो उनका भी उपचार कीजिए.

डिम्पल हो, तिल हो, जो भी हो उसका महत्व है,
ऐसे ही दाग चेहरे के स्वीकार कीजिए

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम …

पहाड़ों ने थामा है सर्दी का परचम,
फ़िज़ाओं में कोहरे की बजती है सरगम.

डिनर सुरमई अब्र पर बुक है अपना,
परिंदों के पर पे चलें बैठ के हम.

वहीं चाँदनी सो रही मस्त हो के,
जहाँ बर्फ़ की है रज़ाई मुलायम.

हवा सर्द मौसम के नश्तर हों जैसे,
खिली धूप जैसे के जाड़ों की मरहम.

चिनारों पे फ़ुर्क़त के लम्हे मिलेंगे,
सुलगते हैं यादों की सिगड़ी में तुम-हम.

चहकने लगे कुछ रिबन आसमानी,
हरी पत्तियों पर गिरी यूँ ही शबनम.

न जाड़ों में ठंडी, न गर्मी गरम हो,
ख़ुदा मान जाए तो बदले ये सिस्टम.

शटर दिन का खुलने पे दिखने लगा है,
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम.
(तरही ग़ज़ल)